क्यों भगवान गणेश का सिर हाथी का है? जानिए पूरी पौराणिक कथा

Lord Ganesha

भगवान गणेश के हाथीमुख होने की कथा हिंदू धर्म की सबसे प्रिय कहानियों में से एक है। यह सिर्फ़ देवताओं और युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि इसमें माँ का स्नेह, बेटे की निष्ठा और एक ऐसे देवता की उत्पत्ति छुपी है जिनकी पूजा आज भी हर शुभ कार्य से पहले की जाती है।

आइए जानते हैं पूरी कथा

माँ पार्वती की इच्छा

कहानी कैलाश पर्वत से शुरू होती है। देवी पार्वती, भगवान शिव की पत्नी, स्नान करना चाहती थीं और उन्हें पूरी निजता चाहिए थी।

इसके लिए उन्होंने अपने शरीर से निकले हल्दी के लेप (कुछ कथाओं में मिट्टी) से एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई और अपनी दिव्य शक्ति से उसमें प्राण फूँक दिए।

बालक जीवित हो उठा, शक्तिशाली, सुंदर और अपनी माँ के प्रति पूर्ण समर्पित। देवी पार्वती ने उसे अपना पुत्र माना और आदेश दिया: “दरवाज़े पर पहरा दो, जब तक मैं स्नान करूँ, किसी को भीतर मत आने देना।”

बालक ने आदेश मानकर दृढ़ निश्चय के साथ पहरा देना शुरू किया।

दरवाज़े पर टकराव

उसी समय भगवान शिव अपने घर लौटे। लेकिन दरवाज़े पर खड़ा यह अजनबी बालक उन्हें रोक देता है।

“रुकिए!”, बालक ने कहा, “मेरी माँ ने आदेश दिया है, कोई भीतर नहीं जा सकता।”

शिव मुस्कराए और बोले, “बेटे, क्या तुम जानते हो मैं कौन हूँ? यह मेरा घर है और पार्वती मेरी पत्नी।”

लेकिन बालक अडिग रहा। “मुझे सिर्फ़ माँ का आदेश मानना है। कोई भी अंदर नहीं जा सकता।”

बात धीरे-धीरे विवाद में बदल गई। शिव के गणों ने ज़बरदस्ती अंदर जाने की कोशिश की, लेकिन माँ की शक्ति से बलवान बालक ने सबको रोक दिया। अब स्वयं महादेव को अपने ही घर के दरवाज़े पर चुनौती मिल रही थी।

दुखद मोड़

आख़िरकार शिव का धैर्य टूट गया। क्रोध में आकर उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया और एक ही वार में बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया।

जब पार्वती बाहर आईं और अपने पुत्र को मृत पाया, तो उनका हृदय चकनाचूर हो गया। उनका शोक और क्रोध इतना प्रचंड था कि ब्रह्मांड काँप उठा। उन्होंने शिव से कहा कि यह उनका पुत्र था। शिव गहरे पश्चाताप में डूब गए।

हाथी का वरदान

अपनी गलती सुधारने के लिए शिव ने प्रण लिया कि वे बालक को पुनर्जीवित करेंगे। उन्होंने अपने गणों को आदेश दिया: “उत्तर दिशा में मुँह करके लेटे पहले जीव का सिर लेकर आओ।”

गणों को रास्ते में एक हाथिनी मिली, जो अपने मृत शावक पर विलाप कर रही थी। शावक उत्तर दिशा की ओर मुँह करके मृत पड़ा था। वे उसका सिर लेकर लौट आए।

शिव ने उस सिर को बालक के धड़ पर लगाया, शक्तिशाली मंत्रों का उच्चारण किया और उसमें प्राण फूँक दिए। बालक फिर से जीवित हो उठा, पर अब उसके पास हाथी का सिर और देवता का शरीर था।

शिव का आशीर्वाद

पार्वती ने अपने पुत्र को गले लगाया। शिव ने भी उसे स्नेह से अपनाया और तीन वरदान दिए:

वह गणों का स्वामी होगा और गणपति अथवा गणेश कहलाएगा।

वह विघ्नहर्ता होगा, यानी सब बाधाओं को दूर करेगा। हर काम की शुरुआत उससे होगी।

हर पूजा, हर यज्ञ में सबसे पहले उसकी आराधना होगी। बिना गणेश पूजा कोई भी अनुष्ठान पूर्ण नहीं माना जाएगा।

इस कथा का संदेश

इस प्रकार भगवान गणेश हाथीमुख वाले प्रिय देवता बने। उनकी अद्वितीय आकृति हमें यह सिखाती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा (आत्मा) शाश्वत है।

आज भी हर शुभ कार्य से पहले “गणपति बप्पा” का नाम लिया जाता है, क्योंकि वे सिर्फ़ विघ्नहर्ता ही नहीं बल्कि बुद्धि, शक्ति और प्रेम के प्रतीक भी हैं।

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