भगवान कृष्ण की बसाई गई भव्य द्वारका नगरी का समुद्र में डूब जाना हिंदू पौराणिक कथाओं की सबसे रहस्यमयी घटनाओं में से एक है। इसका ज़िक्र महाभारत और भागवत पुराण में मिलता है। यह घटना न केवल श्रीकृष्ण के पृथ्वी से प्रस्थान का संकेत देती है, बल्कि नए युग कलियुग की शुरुआत भी।
आइए जानते हैं, कैसे श्राप, अहंकार और समय की गति ने इस दिव्य नगरी का अंत कर दिया।
गांधारी का श्राप: अंत की शुरुआत
महाभारत युद्ध के बाद, जब गांधारी ने अपने सौ पुत्रों को खो दिया, तो उनका दुख और क्रोध असीम था। उन्हें लगता था कि यदि कृष्ण चाहते, तो यह युद्ध रोका जा सकता था।
जब श्रीकृष्ण सांत्वना देने पहुंचे, तो शोकाकुल गांधारी ने उन्हें श्राप दिया, जैसे कौरव वंश नष्ट हुआ, वैसे ही यादव वंश भी आपसी कलह में नष्ट होगा। साथ ही उन्होंने कहा कि कृष्ण की मृत्यु जंगल में अकेले होगी।
कृष्ण ने इस श्राप को सहज भाव से स्वीकार किया और कहा कि यही नियति है, पृथ्वी को बोझ से मुक्त करना उनका कार्य था और अब वह पूरा हो चुका है।
ऋषियों की भविष्यवाणी
कुछ सालों बाद, द्वारका में रहने वाले यादव धन और शक्ति के नशे में चूर हो गए। एक दिन शरारत में कृष्ण के पुत्र सांब को गर्भवती स्त्री का रूप देकर उन्होंने आए हुए ऋषियों से मज़ाक किया और पूछा, “ये पुत्र देगी या पुत्री?”
ऋषि अपमानित हुए और श्राप दिया, “यह बालक एक लोहे का गदा पैदा करेगा, जिससे पूरा यादव वंश नष्ट हो जाएगा।”
अगले ही दिन सांब ने सचमुच लोहे का गदा उत्पन्न किया। डर के मारे राजा उग्रसेन ने उसे चूर-चूर करवा कर समुद्र में फेंक दिया। लेकिन उस गदा की भस्म समुद्र किनारे उगकर एरक घास बन गई, जो आगे विनाश का कारण बनी।
मदिरा में डूबा यादव समाज
एक उत्सव के दौरान, यादव अत्यधिक शराब पीकर आपस में उलझ पड़े। धीरे-धीरे झगड़ा भयंकर लड़ाई में बदल गया। गुस्से में उन्होंने वही एरक घास तोड़ी, जो हाथ में आते ही लोहे की गदा में बदल गई।
यादवों ने इन्हीं गदाओं से एक-दूसरे का संहार कर दिया। इस नरसंहार में कृष्ण के भाई और पुत्र तक मारे गए। इस तरह गांधारी और ऋषियों का श्राप पूरा हुआ।

भगवान कृष्ण का अंतिम समय
अपने वंश का अंत देखकर श्रीकृष्ण विषाद से भर गए और जंगल में ध्यान लगाने चले गए। एक वृक्ष के नीचे योग मुद्रा में बैठे कृष्ण के पैर का हिस्सा बाहर दिखाई दे रहा था।
उसी समय जरा नामक एक शिकारी ने उनके पैर को हिरण समझकर बाण चला दिया। बाण लगते ही कृष्ण गंभीर रूप से घायल हो गए। परंतु उन्होंने शिकारी को क्षमा कर आशीर्वाद दिया और अपने पृथ्वी जीवन का समापन किया। यही क्षण द्वापर युग के अंत का प्रतीक बना।
समुद्र ने निगल ली द्वारका
कृष्ण के रथ सारथी दारुक ने यह समाचार द्वारका पहुंचाया। पांडवों में से अर्जुन वहां आए और बचे हुए स्त्रियों-बच्चों को सुरक्षित बाहर ले गए। कृष्ण के पौत्र वज्र को नया राजा बनाया गया।
लेकिन दिव्य रक्षक के बिना द्वारका की महिमा समाप्त हो चुकी थी। शीघ्र ही समुद्र की लहरें उठीं और पूरी नगरी को निगल गईं। लोग सुरक्षित स्थल तक पहुंच गए, पर द्वारका हमेशा के लिए समुद्र में समा गई।