मगध का राजा जरासंध प्राचीन भारत के सबसे खतरनाक और निर्दयी शासकों में से एक था। ताकत में वो बेमिसाल था, लेकिन अपनी क्रूरता के लिए भी मशहूर। वह कंस का ससुर था, वही कंस, जिसे कृष्ण ने उसके आतंक का अंत करने के लिए मार दिया था। कंस की मौत से बौखलाए जरासंध ने बदला लेने की कसम खाई और अपनी विशाल सेना के साथ मथुरा पर 17 बार हमला किया।
श्री कृष्ण की चालाकी
भले ही श्री कृष्ण दिव्य शक्ति वाले थे और जरासंध को हराना उनके लिए मुश्किल नहीं था, लेकिन उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। सीधे युद्ध में जाने के बजाय, उन्होंने मथुरा के नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। श्री कृष्ण ने अपनी राजधानी को पश्चिम में स्थित समुद्री किले द्वारका में स्थानांतरित कर लिया, जहां तक पहुँचना जरासंध के लिए लगभग नामुमकिन था।
लेकिन जरासंध यहीं नहीं रुका। अपने अभियानों में उसने 86 राजाओं को कैद कर लिया और उन्हें एक ऐसे यज्ञ में बलि देने की योजना बनाई जिससे उसे अजेयता प्राप्त हो जाती। श्री कृष्ण की सलाह पर पांडवों ने समझा कि जरासंध का अंत करना जरूरी है, सिर्फ राजनीति के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और कैदियों की मुक्ति के लिए भी।
महायुद्ध: भीम बनाम जरासंध
श्री कृष्ण, अर्जुन और भीम साधु का वेश धरकर जरासंध के दरबार पहुंचे। जब राजा ने उन्हें वर मांगने का अवसर दिया, तो कृष्ण ने असली पहचान उजागर कर दी और उसे युद्ध की चुनौती दी। जरासंध ने क्षत्रिय धर्म निभाते हुए श्री कृष्ण के बजाय भीम को प्रतिद्वंदी चुना।
इसके बाद जरासंध और भीम के बिच 27 दिनों तक जोरदार कुश्ती मुकाबला चला, दोनों योद्धा बराबरी के थे और कोई पीछे हटने को तैयार नहीं। जरासंध की ताकत अद्वितीय थी, लेकिन श्री कृष्ण जानते थे कि उसे सामान्य तरीकों से मारा नहीं जा सकता।
जरासंध के जन्म का रहस्य
जरासंध का नाम ही उसके अजीब जन्म से जुड़ा है। वह दो अलग-अलग हिस्सों में पैदा हुआ था, जिन्हें एक राक्षसी जरा ने जोड़ दिया था। इसी कारण वह लगभग अजेय था—उसे मारने का एकमात्र तरीका था कि उसके शरीर को फिर से दो हिस्सों में बांट दिया जाए।
श्री कृष्ण ने बिना बोले इशारा किया, एक टहनी को दो टुकड़ों में तोड़कर दोनों हिस्सों को अलग-अलग फेंक दिया। इशारा समझते ही भीम ने जरासंध की टांगें पकड़ीं और उसे बीच से चीर दिया। अत्याचारी का अंत हो गया।
मुक्ति और नया दौर
जरासंध के मरते ही उसका बेटा सहदेव मगध का राजा बना और शांति का वचन दिया। 86 कैद किए गए राजा आज़ाद हो गए और कृष्ण की बुद्धिमानी की चारों ओर प्रशंसा हुई। इस जीत ने युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का रास्ता साफ कर दिया, जिससे पांडवों का राजधर्म और भी मजबूत हो गया।