भीष्म पितामह ने महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से युद्ध किया था, लेकिन उनकी मृत्यु एक विचित्र और दुखद घटना थी। उनकी मृत्यु के पीछे कई कारण और रहस्यमय तथ्य थे।
भीष्म को अपने पिता शांतनु से प्राप्त “इच्छा मृत्यु” का वरदान प्राप्त था, जिससे वे अपनी इच्छानुसार दीर्घायु हो सकते थे। इसके अलावा, वे एक महान योद्धा और अजेय थे क्योंकि उन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया था, जिससे उन्हें दिव्य शक्तियाँ प्राप्त हुईं। वे एक महान शस्त्र विशेषज्ञ थे और युद्धकला में निपुण थे। देवताओं ने स्वयं उन्हें आशीर्वाद दिया था।
जब पांडव भीष्म पितामह को पराजित करने में असफल रहे, तो भगवान कृष्ण ने उन्हें एक युक्ति बताई। भीष्म ने पहले ही यह व्रत ले लिया था कि वे किसी स्त्री के विरुद्ध शस्त्र नहीं उठाएँगे। इसका लाभ उठाकर, अर्जुन ने शिखंडी (जो पहले स्त्री था, लेकिन बाद में पुरुष बन गया) को अपने सामने खड़ा कर दिया। शिखंडी को देखते ही भीष्म ने अपने शस्त्र त्याग दिए क्योंकि वे उससे युद्ध नहीं करना चाहते थे।
जब भीष्म ने अपने शस्त्र त्याग दिए, तो अर्जुन ने उन पर बाणों की वर्षा कर दी। भीष्म पितामह का पूरा शरीर बाणों से छलनी हो गया, लेकिन वे ज़मीन पर नहीं गिरे, क्योंकि बाणों ने उनके शरीर को सहारा दिया था। इस प्रकार भीष्म बाणशय्या पर लेट गए।
भीष्म ने तब तक प्राण त्यागे नहीं जब तक सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं हो गया, क्योंकि इस समय मृत्यु मोक्ष की प्राप्ति कराती है। युद्ध समाप्त होने के बाद, जब सूर्य उत्तरायण हो गया, तब भीष्म ने प्राण त्याग दिए। मरने से पहले उन्होंने युधिष्ठिर को राजधर्म और नीतिशास्त्र का ज्ञान दिया, जिसे “भीष्म नीति” कहा जाता है।
भीष्म पितामह की मृत्यु ने कौरवों का सबसे बड़ा सहारा छीन लिया। उनकी मृत्यु धर्म और निष्ठा का प्रतीक है क्योंकि उन्होंने अपने वचन का पालन करते हुए अपने प्राण त्याग दिए। महाभारत में उनका चरित्र त्याग, बलिदान और कर्तव्यनिष्ठा का एक उदाहरण है।