गणेशजी बनाम कार्तिकेय की कहानी काफी रोचक है। भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय (जिन्हें स्कंद या मुरुगन भी कहा जाता है) की दौड़ की कहानी हिंदू धर्म की सबसे लोकप्रिय कथाओं में से एक है। यह कथा सिखाती है कि बुद्धि और भक्ति हमेशा ताकत और गति से बड़ी होती है।
एक दिन दिव्य ऋषि नारद भगवान शिव और माता पार्वती के पास पहुंचे। उनके हाथ में एक विशेष फल था, ज्ञान और बुद्धि का फल। स्वाभाविक था कि दोनों पुत्र, गणेश और कार्तिकेय, उस फल को पाना चाहते थे।
झगड़े से बचने के लिए शिव-पार्वती ने एक परीक्षा रखी। उन्होंने कहा:
“जो सबसे पहले पूरी दुनिया का चक्कर लगाकर वापस आएगा, वही इस फल का अधिकारी होगा।”
कार्तिकेय, जो तेज और बलवान थे, तुरंत अपने विशाल मोर पर सवार होकर उड़ पड़े। उन्होंने पर्वतों, समुद्रों, जंगलों और धरती का अद्भुत वेग से चक्कर लगाया।
गणेश जी की स्थिति अलग थी। उनका वाहन एक छोटा-सा मूषक (चूहा) था, जो मोर से मुकाबला नहीं कर सकता था। लेकिन गणेश जी ने हार मानने के बजाय गहराई से सोचा।
उन्होंने माता-पिता के सामने हाथ जोड़कर तीन बार उनकी परिक्रमा की और कहा:
“मेरे लिए मेरे माता-पिता ही मेरा पूरा संसार हैं। इन्हें तीन बार घेरकर मैंने पूरे ब्रह्मांड का चक्कर पूरा कर लिया है।”
भगवान शिव और माता पार्वती उनकी बुद्धि और भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ज्ञान का फल गणेश जी को दे दिया।
जब कार्तिकेय लौटे तो थके हुए लेकिन गर्व से भरे थे। उन्हें देखकर आश्चर्य हुआ कि गणेश पहले ही विजेता बन चुके थे। माता-पिता ने प्यार से समझाया, “बुद्धि और भक्ति हमेशा ताकत और गति से श्रेष्ठ होती है।”
यह अमर कथा हमें याद दिलाती है कि जीवन में असली जीत समझदारी और श्रद्धा से ही मिलती है।