बर्बरीक के पास इतनी शक्ति थी कि वह अकेले ही 1 मिनट में पूरा युद्ध समाप्त कर सकता था! फिर भी, उसने युद्ध नहीं लड़ा। क्यों? आइए जानते हैं यह रोचक कहानी…
बर्बरीक कौन थे?
बर्बरीक घटोत्कच और भीम के पौत्र मौरवी (नागकन्या अहिलवती) के पुत्र थे। उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या करके तीन अजेय बाण (त्रिशूल के समान शक्तिशाली) प्राप्त किए थे।
बर्बरीक की महान शक्ति
पहला बाण – किसी भी लक्ष्य पर निशाना साध सकता था।
दूसरा बाण – चिह्नित लक्ष्य को नष्ट कर सकता था।
तीसरा बाण – नष्ट हुए लक्ष्य को पुनर्जीवित कर सकता था!
इन बाणों की सहायता से, वह क्षण भर में पूरी सेना को मारकर उन्हें पुनः जीवित कर सकता था!
कृष्ण ने बर्बरीक की परीक्षा क्यों ली?
जब बर्बरीक ने युद्ध में भाग लेने का निश्चय किया, तो श्री कृष्ण (ब्राह्मण वेश में) उसके सामने प्रकट हुए और पूछा:
“तुम किस पक्ष की ओर से लड़ोगे?”
बर्बरीक ने कहा:
“मैंने अपनी माँ से वचन लिया है कि मैं हमेशा कमज़ोर पक्ष का साथ दूँगा। मैं उस पक्ष की ओर से लड़ूँगा जो हारने लगेगा!”
यह सुनकर कृष्ण समझ गए कि अगर बर्बरीक युद्ध में शामिल हुआ, तो संतुलन बिगड़ जाएगा, क्योंकि वह बार-बार पीछे मुड़कर युद्ध को अनंत तक खींच लेगा।
कृष्ण ने बर्बरीक का सिर दान में माँगा!
श्री कृष्ण ने बर्बरीक से कहा:
“यदि तुम एक महान योद्धा हो, तो अपना सिर दान कर दो!”
बर्बरीक पहचान गए कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं, बल्कि स्वयं भगवान थे। बिना किसी हिचकिचाहट के, उन्होंने अपना सिर काटकर दान कर दिया!
बर्बरीक का सिर युद्ध का साक्षी बन गया।
कृष्ण ने बर्बरीक का सिर एक पहाड़ी पर रख दिया, जहाँ से वह पूरा युद्ध देख सकता था।
युद्ध के बाद, पांडवों में इस बात पर विवाद हुआ कि युद्ध जीतने का श्रेय किसे दिया जाए।
तब बर्बरीक के शीश ने कहा:
“पूरे युद्ध में केवल श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र और गदा ही काम कर रहे थे, बाकी तो बस शरारती कठपुतलियाँ थीं!”
इससे सिद्ध हुआ कि असली विजेता तो भगवान कृष्ण ही थे।
आज भी बर्बरीक की पूजा की जाती है।
बर्बरीक को “खाटू श्याम” के नाम से पूजा जाता है।
राजस्थान के खाटू कस्बे में उनका प्रसिद्ध मंदिर है, जहाँ लाखों भक्त उनके दर्शन के लिए आते हैं।
मान्यता है कि सच्चे मन से खाटू श्याम का स्मरण करने वाले भक्त के हर कष्ट दूर हो जाते हैं।