महाभारत की विराट गाथा में अगर सबसे भावुक और रोमांचक प्रसंग की बात की जाए, तो अभिमन्यु और चक्रव्यूह का प्रसंग जरूर याद आता है। महज 16 साल की उम्र में अर्जुन-पुत्र अभिमन्यु ने जो साहस और बलिदान दिखाया, वह आज भी लोगों के दिलों को छू जाता है।
चक्रव्यूह क्या था?
महाभारत युद्ध में कौरवों ने पांडवों को मात देने के लिए एक खास रणनीति अपनाई। इसे कहते थे “चक्रव्यूह”, जिसमें घुसना ही कठिन और उससे बाहर निकलना उससे भी अधिक कठिन था। इस गुप्त युद्धकला को बहुत कम योद्धा जानते थे। अर्जुन उनमें से एक थे।
अधूरा ज्ञान, बड़ा जोखिम
कहते हैं कि जब अभिमन्यु अपनी मां सुभद्रा के गर्भ में थे, तब अर्जुन ने उन्हें चक्रव्यूह भेदने का तरीका सुनाया था। लेकिन बीच में ही सुभद्रा सो गईं और ज्ञान अधूरा रह गया। नतीजा यह हुआ कि अभिमन्यु को चक्रव्यूह में घुसना तो आता था, लेकिन उससे बाहर निकलना नहीं।
अभिमन्यु की शपथ
युद्ध के 13वें दिन कौरवों ने चक्रव्यूह बनाया। संयोग ऐसा था कि उस दिन अर्जुन रणभूमि से दूर थे। पांडव सेना असमंजस में थी कि अब इस अभेद्य घेरे को कौन तोड़ेगा।
तभी अभिमन्यु ने आगे बढ़कर कहा, “मुझे चक्रव्यूह तोड़ना आता है। मैं घुस जाऊंगा, आप सब पीछे-पीछे आइए।”
कम उम्र के बावजूद उसका आत्मविश्वास और साहस देखने लायक था।
अकेला नायक, सामने महाबली
अभिमन्यु ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए चक्रव्यूह को भेद दिया। लेकिन दुर्भाग्य से पांडव सेना पीछे नहीं पहुंच पाई और वह अकेला ही भीतर फंस गया। भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, कृपाचार्य और दुर्योधन का पुत्र सब ने मिलकर उसे चारों ओर से घेर लिया। फिर भी अभिमन्यु ने अपूर्व वीरता दिखाते हुए कई योद्धाओं को धराशायी कर दिया।
नियम तोड़कर किया वध
कौरवों को लगा कि एक अकेला किशोर योद्धा उन्हें भारी पड़ रहा है। तब उन्होंने युद्ध के नियम तोड़ दिए। दुर्योधन के पुत्र ने उसका धनुष तोड़ा, कर्ण ने रथ की लगाम काट दी और बाकी योद्धाओं ने मिलकर उसे निहत्था कर दिया। अंत तक लड़ते रहे अभिमन्यु को बेरहमी से मार डाला गया।
16 साल का अमर बलिदान
महज 16 साल की उम्र में अभिमन्यु ने अकेले पूरी कौरव सेना का सामना किया। वह शहीद हुए, लेकिन उनकी शौर्यगाथा अमर हो गई। आज भी महाभारत का यह प्रसंग हमें याद दिलाता है कि असली वीर वही है जो कठिनाइयों के सामने हार न माने।