चीन की फैक्ट्री गतिविधियां अगस्त में लगातार पांचवें महीने सिकुड़ने की कगार पर हैं। इसकी बड़ी वजह है, अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर अनिश्चितता। वहीं, कमजोर खपत, डगमगाता नौकरी बाजार और गहराता प्रॉपर्टी संकट भी देश की अर्थव्यवस्था को नीचे खींच रहे हैं। रॉयटर्स के एक सर्वे में यह जानकारी सामने आई है।
2025 का टारगेट खतरे में
अर्थशास्त्रियों का कहना है कि चीन की परेशानी यहीं खत्म नहीं होती। खराब मौसम और पैसों की तंगी झेल रही स्थानीय सरकारें भी हालात बिगाड़ रही हैं। यही वजह है कि बीजिंग का 2025 तक 5% के आसपास जीडीपी ग्रोथ का लक्ष्य अब खतरे में दिख रहा है।
निर्यात पर दबाव
जुलाई में चीन के निर्यात उम्मीद से बेहतर रहे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह सुधार उतना मजबूत नहीं है जितना दिख रहा है। असल में, पिछले साल की कमज़ोर बेसलाइन और दक्षिण-पूर्व एशिया को बढ़ी हुई शिपमेंट्स ने आंकड़ों को ऊपर खींचा। अमेरिका के नुकसान की भरपाई के लिए चीनी निर्यातक अब तेजी से नए बाज़ार तलाश रहे हैं। एक निर्माता ने हालात को “पागलों की दौड़” करार दिया।
इस बीच, वॉशिंगटन और बीजिंग ने हाल ही में टैरिफ ट्रूस को 90 दिन और बढ़ा दिया है। यानी अमेरिकी सामान पर चीन का 10% टैक्स और चीनी सामान पर अमेरिका का 30% टैक्स अभी बरकरार रहेगा। यह कदम बड़े टकराव को टालता है, लेकिन कारोबारियों की चिंता कम करने में असफल रहा है।
मुनाफे पर चोट
चीन की इंडस्ट्रियल कंपनियों के मुनाफे पर भी दबाव बना हुआ है। जुलाई में लगातार तीसरे महीने मुनाफा घटा है। घरेलू मांग कमजोर होने और फैक्ट्री-गेट कीमतों में गिरावट ने कंपनियों की कमर तोड़ दी है। अब सभी की नज़र बीजिंग पर है कि वह हालात संभालने के लिए और क्या कदम उठाएगा।
नौकरी बाजार में चिंता
नौकरी के मोर्चे पर भी राहत नहीं है। जुलाई में शहरी बेरोजगारी दर 5% से बढ़कर 5.2% हो गई। हालात और मुश्किल इसलिए हो सकते हैं क्योंकि चीन की सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक आदेश दिया है, अब कंपनियां और कर्मचारी सामाजिक सुरक्षा (सोशल इंश्योरेंस) के भुगतान से बच नहीं सकते।
सरकार का मकसद तो पेंशन फंड को मजबूत करना है, लेकिन अर्थशास्त्रियों को डर है कि कंपनियां इसका असर कर्मचारियों की छंटनी करके दिखा सकती हैं। ऐसे समय में जब पहले ही कारोबार और कर्मचारी दोनों वित्तीय दबाव में हैं, यह फैसला और मुसीबत बढ़ा सकता है।
मौसम की मार और पैसों की किल्लत
इतना ही नहीं, मौसम भी अर्थव्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा रहा है। 1 जुलाई से अब तक आए तूफानों और बाढ़ ने करीब 2.2 अरब डॉलर की सड़कों को नुकसान पहुंचाया है। स्थानीय सरकारें पहले से ही जमीन बिक्री से होने वाली कमाई में गिरावट झेल रही हैं, ऊपर से यह नया बोझ उनके लिए भारी साबित हो रहा है।