महाभारत युद्ध के अंत में, गांधारी ने अपने सभी पुत्रों, कौरवों की मृत्यु के लिए भगवान श्री कृष्ण को दोषी ठहराया। गांधारी का हृदय दुःख, क्रोध और शोक से भर गया। वह जानती थी कि श्री कृष्ण इस युद्ध को रोक सकते थे।
गांधारी का क्रोध और श्राप
गांधारी हर गुजरते दिन अपने पुत्रों को मरते हुए देखती रही, और अंत में, भीम के हाथों उसके प्रिय पुत्र दुर्योधन की मृत्यु हो गई। वह श्री कृष्ण के पास गई और उन पर आरोप लगाया, “आप सब कुछ जानते हुए भी चुप रहे! आपने युद्ध क्यों नहीं रोका?”
अपने पुत्र दुर्योधन के न रहने की बात जानकर गांधारी क्रोधित और दुःखी हो गईं। गांधारी ने भगवान कृष्ण को दोषी ठहराया और कहा, “जिस प्रकार मेरे कुल का नाश हुआ, उसी प्रकार आपके यदुवंशी भी आपस में लड़कर नष्ट हो जाएँगे।” श्री कृष्ण ने सहर्ष श्राप स्वीकार कर लिया।
कुछ वर्षों के बाद, यादव आपस में लड़ने लगे और पूरा यदुवंश नष्ट हो गया। श्रीकृष्ण स्वयं एक शिकारी (जिसे उन्होंने पूर्वजन्म में श्राप दिया था) के बाण से मारे गए।
गांधारी के श्राप की गहराई
यह श्राप केवल क्रोध का परिणाम नहीं है, बल्कि धर्म की गहरी शिक्षा देता है। अहंकार और घृणा (कौरवों के प्रति) विनाश का कारण बनते हैं। न्याय में देरी हो सकती है, लेकिन अन्याय अंततः पराजय का कारण बनता है। कर्मफल से ईश्वर भी मुक्त नहीं हैं। कृष्ण ने श्राप को टाला नहीं, बल्कि उसे स्वीकार किया।
क्या गांधारी का श्राप उचित था?
कुछ लोग मानते हैं कि दुःख में दिया गया गांधारी का श्राप उचित नहीं था, क्योंकि कौरवों का पतन उनके कर्मों का परिणाम था। लेकिन दूसरी ओर, यह घटना महाभारत की नियति को दर्शाती है, जहाँ प्रत्येक पात्र को अपने कर्मों का फल भोगना पड़ा।